(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

सभापर्व ~ महाभारत | Mahabharat Sabha Parv In Hindi


॥ श्रीः ॥
2.18. अध्यायः 018
Mahabharata - Sabha Parva - Chapter Topics
राजानम्प्रति स्वस्वरूपमभिधाय जराया अन्तर्धानम्॥ 1॥
Mahabharata - Sabha Parva - Chapter Text

राक्षस्युवाच॥

जरा नामास्मि भद्रं ते राक्षसी कामरूपिणी।
तव वेश्मनि राजेन्द्र पूजिता न्यवसं सुखम्॥ 2-18-1(12063)
गृहे गृहे मनुष्याणां नित्यं तिष्ठामि राक्षसी।
गृहदेवीति नाम्ना वै पुरा सृष्टा स्वयंम्भुवा॥ 2-18-2(12064)
दानवानां विनाशाय स्थापिता दिव्यरूपिणी।
यो मां भक्त्या लिखेत्कुड्ये सपुत्रां यौवनान्विताम्॥ 2-18-3(12065)
गृहे तस्य भवेद्वृद्धिरन्यथा क्षयमाप्नुयात्।
त्वद्गृहे तिष्ठमानाऽहं पूजिताऽहं सदा विभो॥ 2-18-4(12066)
लिखिता चैव कुड्येषु पुत्रैर्बहुभिरावृता।
गन्धपुष्पैस्तथा धूपैर्भक्ष्यभोज्यैः सुपूजिता॥ 2-18-5(12067)
साऽहं प्रत्युपकारार्थं चिन्तयन्त्यनिशं नृप।
तवेमे पुत्रशकले दृष्टवत्यस्मि धार्मिका। 2-18-6(12068)
संश्लिषिते मया दैवात्कुमारः समपद्यत।
तव भाग्यान्महाराज हेतुमात्रमहं त्विह॥ 2-18-7(12069)
मेरुं वा खादितुं शक्ता किं पुनस्तव बालकम्।
गृहसम्पूजनात्तुष्ट्या मया प्रत्यर्पितस्तव॥ 2-18-8(12070)
मम नाम्ना च लोकेऽस्मिन्ख्यात एव भविष्यति। 2-18-9(12071)
कृष्ण उवाच।
एवमुक्त्वा तु सा राजंस्तत्रैवान्तरधीयत।
स सङ्गृह्य कुमारं तं प्रविवेश गृहं नृपः॥ 2-18-9x(1412)
तस्य बालस्य यत्कृत्यं तच्चकार नृपस्तदा।
आज्ञापयच्च राक्षस्या मगधेषु महोत्सवम्॥ 2-18-10(12072)
तस्य नामाकरोच्चैव पितामहसमः पिता।
जरया सन्धितो यस्माज्जरासन्धो भवत्वयम्॥ 2-18-11(12073)
सोऽवर्धत महातेजा मागधाधिपतेः सुतः।
प्रमाणबलसम्पन्नो हुताहुतिरिवानलः॥ 2-18-12(12074)
`एवं स ववृधे राजन्कुमारः पुष्करेक्षणः।
कालेन महता चापि यौवनस्थो बभूव ह'॥
मातापित्रोर्नन्दकरः शुक्लपक्षे यथा शशी॥ ॥ 2-18-13(12075)

इति श्रीमन्महाभारते सभापर्वणि मन्त्रपर्वणि अष्टादशोऽध्यायः॥ 18॥


Mahabharat- Hindi (Devanagari) 100000 shlokas

www.sanatanadharm.com - play store app (sanatana dharm)

"Bharathiya Sanatana Dharm" and Sanatana Dharmam & Dharmo rakshati Rakshitha logo are our trademarks. Unauthorised use of "Sanatana Dharmam & Dharmo rakshoati Rakshitha" and the logo is not allowed. Copyright © sanatanadharm.com All Rights Reserved . Made in India.